इंतेज़ार
कविता: इंतज़ार
कैसी मुश्किल घड़ी है, पर नहीं होना बेज़ार ।
गुज़र जाएगा ये वक्त भी, सभी को है ये इंतजार।।
बढ़ गयी पुलिस की चौकसी, बढ़ गया डाँक्टरों का काम,
निस्वार्थ सेवाभाव मेंं, भूल गए सब आराम।
जगा रहें उम्मीद की किरणें,लौटा रहें मुस्कुराहटें,
जीवन को खींच ले, मृत्यु के बहुपाश से,
इसी जद्दोजहद मेंं,सुबह से हुई शाम।।
कैसी मुश्किल घड़ी है, पर नहीं होना बेज़ार ।
गुज़र जाएगा ये वक्त भी, सभी को है ये इंतजार।।
चुपचाप सी हैं सड़कें, गुमसुम हैंं बाज़ार,
ठहर गए मुलाकातों के सिलसिले,
थम गई ज़िन्दगी की रफ्तार।।
'कोरोना' से जंग जीतने की तमाम कोशिशों मेंं
दे रहें सब योगदान,
धीरज धरो,मुक्कमल होगें, ख्वाब अनकहे,
हौसलों को दो नयी उड़ान।
कैसी मुश्किल घड़ी है, पर नहीं होना बेज़ार ।
गुज़र जाएगा ये वक्त भी, सभी को है ये इंतजार।।
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