संदेश

खामोशी

  खामोशी नवयौवना सी इठलाती हवाऐं। हसँते फूल और गुनगुनाती कोयलेंं , कहतीं हैं ये क्या । आओ खामोशी से इन्हें सुनें ।। मन की पीड़ा के कोलाहल का और प्रियजन के आर्तनाद का, गहरे भीतर अधंकार का आओ खामोशी से हल सुझावेंं ।। समय सही है विचार मंथन का स्वयं का ईश्वर से परिचय का , ह्रदय में दीप जलाऐं । आओ खामोशी से ईश मिलन को पूर्ण बनाऐँ ।।

दोस्त

 दोस्त स्मृतियों के आलेख से आओ दोस्त, चुरा लें 'वो' पलछिन, 'वो' यादें। जा चुके बचपन की 'वो' प्यारी बातें।। समुंदर किनारे कही हमारी अनकही बतकही, और सपनों के जादुई संसार बसाना। झिलमिलाते तारों को देख, अपनी ही कहानी को सच बतलाना। ना मानूँ जो रूठ जाऊँ, फिर तुम्हारा यूँ मनाना, हमेशा संग-संग रहना, कभी हँसना-कभी रोना। आओ दोस्त, चुरा लें 'वो' पलछिन 'वो' यादें, जा चुके बचपन की 'वो' प्यारी बातें।। धुंध कोहरे सा, खो गया साथ तुम्हारा, जो कदम-दर-कदम साथ चलते थे, एक दूजे संग। आओ फिर थाम कर एक दूजे को, ढूंढ़े मंज़िल की राहें। खिलती धूप सा खिलखिलाए और  वृक्षओं में लिपटी लताओं सा,एक दूजे का संबल बन जायें। आओ दोस्त दोहराएं हम 'वो' पलछिन 'वो' यादें, जा चुके बचपन की 'वो' प्यारी बातें।।

मन

 रोशनियों में जगमगाता शहर, सोने-चाँदी से सजे हुए घर,  बेशकीमती लबादों से लदे हुए लोग, पर अकेला सा मन।। गहरी-गहरी है रात, चुपचाप है चाँद,  ठहरी-ठहरी है हवा, पर तूफ़ान सा मन।। कोलाहल के बीच, खड़ी यह ऊँची-ऊँची इमारतें, और सुकून में सोता आदमी, वीरान हैं सड़कें, पर दौड़ता सा मन।।

उम्मीद

उम्मीद आंधिया यूँ तो बड़ी तेज़ हैं,  पर उम्मीदों का चिराग़ जलाएँ रखना है।। कितने गहरें हैं, रातों के स्याह बादल, ढ़लते-ढ़लते, ढल  जाएंगे। बस दिल में उम्मीदों को रोशन करना है। बीतेंगे ये मौसम उदासियों के, चुपचाप ये हलाहल पीते जाना है। तकदीरें बदलतीं हैं, नेमतें मिलती हैं, इसी ख्याल से आगे बढ़ते जाना है। कश्तियाँ हैं बीच तूफानी लहरों के, थाम पतवार विश्वास की, पार ले जाना है। चट्टानों सी है मुश्किलें, बुलंद हौसलों से, आगे बढ़ते जाना है। आंधिया यूँ तो बड़ी तेज़ हैं,  पर उम्मीदों का चिराग़ जलाएँ रखना है।।

आज़ादी

           आज़ादी निडर, निश्छल, निराकार मैं, बन्धनों से विरक्त मैं,  हृदयवासिनी, प्राणप्रिय, मैं, हूँ आज़ादी, मेरे रूप अनेक। गौरवशाली 'भारत माँ' हूँ मैं, मुझपर कुर्बान वीर जवान,  रक्षा प्रतिक्षण करें, दासत्व से मुक्ति दें, ऐसे मेरे वीर सपूत नौजवान, मैं, हूँ आज़ादी, मेरे रूप अनेक। बसती हूँ मैं, ज्ञान में, अध्ययन मेरा रूप, अभिव्यक्ति का माध्यम बनूँ, वाणी को सदृढ़ करुं, नवीन ऊर्जा का संचार मैं, मैं, हूँ आज़ादी, मेरे रूप अनेक । मैं, नारियों की उड़ान हूँ, वीर पुरुषों का सम्मान हूँ, लेखनी में मैं, खुशहाली के गीतों में मैं, मैं, मुखर विरोध अनाचार की, मैं, हूँ आज़ादी, मेरे रूप अनेक । मैं,ज्वाला हूँ, धधकती सी, पापियों के सर्वनाश में, निर्बल का आत्मबल हूँ मैं, देशहित में, बलिदान मैं, मैं,लोकतंत्र की रीढ़ हूँ, विदेशी आक्रमण की काट हूँ, मैं, हूँ आज़ादी, मेरे रूप अनेक ।

कविता: 'नज़र'

कविता: 'नज़र'            ये नज़र नज़र के भेद हैं, ये लीला अपरम्पार।           जो पहचान गया, संसार के गूढ़ रहस्य को,वो बूछ गया।।           शराफत हो गयी रूसवा, मिला नज़र नज़र मेंं उसे अविश्वास,           दावँ खेल गयी बेईमानी, मिला नजर नजर में उसे विश्वास ।           चटुकारिता और सलामी पा गयी सम्मान,           व्यर्थ गयी ईमानदारी, ढ़ो रही अपमान।           भ्रष्टाचारी बटोर रहे पुरस्कार,           इंसानियत को मिले तिरस्कार की मार ।           ये नज़र नज़र के भेद हैं, ये लीला अपरम्पार।           जो पहचान गया,संसार के गूढ़ रहस्य को,वो बूछ गया ।।                     नज़र मे ं लेके प्यार, ढक लिए दिल के ज़हर,           ओढ मुस्कुराहट ,छुपा लिए मौत के खंजर।       ...

कर्मवीर बने

                        कर्मवीर बने  संशय के बादलों से ढ़क गए धरती और आकाश, मृत्यु भय की पीड़ा से मृद्धिम हुआ हृदय का प्रकाश। 'कोरोना' के प्रकोप से अस्त व्यस्त हुए नर और नार, आत्मबल का दीप जलाऐं, ऐसा करें प्रयास। आओ कर्मवीर बनें, विजय मार्ग को प्रशस्त करें।। तथागत बुद्ध ने दिए थे, ये विचार, संयमित करें मन और आचार। मितभाषी बने, समरसता का करें व्यवहार, सहयोग एवं प्रेम हो जीवन का आधार। आओ कर्मवीर बनें, विजय मार्ग को प्रशस्त करें।। सेवाभाव हो निस्वार्थ,जनमानस का करें कल्याण, पर-पीड़ा को हरने का संकल्प लेंं, कर्तव्यपथ पर अडिग रहें, अविचल, अविराम। आओ कर्मवीर बनें, विजय मार्ग को प्रशस्त करें।। श्रद्धा-सुमन अर्पित करें उन्हें, जो दे रहें बलिदान, डॉक्टर, पुलिस, सेवाकर्मी को, झुका शीश करें सम्मान। नियमों का अनुपालन कर, दे राष्ट्रहित में योगदान। आओ कर्मवीर बनें, विजय मार्ग को प्रशस्त करें।।