कविता: 'नज़र'
कविता: 'नज़र'
ये नज़र नज़र के भेद हैं, ये लीला अपरम्पार।
जो पहचान गया, संसार के गूढ़ रहस्य को,वो बूछ गया।।
शराफत हो गयी रूसवा, मिला नज़र नज़र मेंं उसे अविश्वास,
दावँ खेल गयी बेईमानी, मिला नजर नजर में उसे विश्वास ।
चटुकारिता और सलामी पा गयी सम्मान,
व्यर्थ गयी ईमानदारी, ढ़ो रही अपमान।
भ्रष्टाचारी बटोर रहे पुरस्कार,
इंसानियत को मिले तिरस्कार की मार ।
ये नज़र नज़र के भेद हैं, ये लीला अपरम्पार।
जो पहचान गया,संसार के गूढ़ रहस्य को,वो बूछ गया ।।
नज़र मे ं लेके प्यार, ढक लिए दिल के ज़हर,
ओढ मुस्कुराहट ,छुपा लिए मौत के खंजर।
मासूमियत पर छा गई उदासी,
गुम गई हँसी, भरे बाज़ार।
चालाकियों और मक्कारियों से,
रोशन हुई महफिल, भरे बाज़ार।
किसी को मिला प्यार, किसी को प्रतिकार ।
ये नज़र नज़र के भेद हैं, ये लीला अपरम्पार।
जो पहचान गया, संसार के गूढ़ रहस्य को,वो बूछ गया।।
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